संत-मत का इतिहास: गुरु परंपरा

जब-जब इस धरती पर कलयुग का प्रभाव बढ़ता है और जीव भटकने लगते हैं, तब-तब जीवों के कल्याण हेतु संत-मत का प्रकटीकरण होता है। यों तो संत-महापुरुष हर युग में गुप्त रूप से विद्यमान रहते हैं, लेकिन जीवों के पूर्ण उद्धार के लिए इनका खुले रूप में प्रकटीकरण कलयुग में ही होता है। आज से लगभग 700 वर्ष पूर्व परम संत कबीर साहेब से जो संत-मत की धारा प्रकट हुई, वह पीढ़ियों का सफर तय करती हुई आज जयगुरुदेव मिशन तक पहुँच चुकी है।

जयगुरुदेव आश्रम की ओर से संत-मत के इसी गौरवशाली इतिहास, गुरु-शिष्य परंपरा और महापुरुषों की कुछ प्रेरक लीलाओं का वर्णन यहाँ प्रस्तुत है:

संत-मत का प्रारंभिक विस्तार और गोस्वामी तुलसीदास जी का रहस्य

नाम और शब्द की महिमा का जो ज्ञान कबीर साहेब से प्रारंभ हुआ, वह अलग-अलग महापुरुषों के माध्यम से जन-मानस तक पहुँचा। कबीर साहेब और गुरु नानक देव जी की गोष्ठी के बाद यह ज्ञान लगातार 10 पीढ़ियों तक सिख गुरु साहिबानों के माध्यम से पंजाब में सुकून और शांति बाँटता रहा। शाह इब्राहिम बादशाह बलख बुखारी के माध्यम से यह मुसलमानी मुल्कों (ईरान, इराक, सऊदी अरब) तक गया। संत रविदास जी के माध्यम से यह आगे बढ़ा।

गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज ने जब संत-मत को जाना, तो उन्होंने सबसे पहले ‘घट रामायण’ की रचना की। लेकिन काशी में विद्वानों के विरोध और विवाद के कारण उन्हें इसे छिपाना पड़ा। इसके बाद उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना की, जिसमें उन्होंने संत-मत (नाम और शब्द की महिमा) को जगह-जगह हीरे की तरह छिपा दिया। यह ध्यान देने योग्य है कि ‘सतलोक’ और ‘सतनाम’ का जिक्र वेदों या पुराने धर्मग्रंथों में नहीं मिलता, इसका सबसे पहला वर्णन कबीर साहेब के महान ग्रंथ ‘अनुराग सागर’ में ही आया था, जहाँ से दुनिया को पहली बार अमर देश और ‘सूरत’ (आत्मा) का भेद पता चला। दादू साहेब, दरिया साहेब और गाजीपुर के भुरकुरा धाम के संतों ने इस आध्यात्मिक ज्योति को आगे बढ़ाया।

आगरा में राधास्वामी मत का प्रकटीकरण

अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान, यह आध्यात्मिक दौलत आगरा शहर की पन्नी गली में प्रकट हुई। यहाँ सिंध से आकर बसे एक खत्री-बनिया परिवार में स्वामी शिव दयाल सिंह जी महाराज का अवतार हुआ। उन्होंने ‘राधास्वामी’ नाम को प्रकट किया, जिसमें ‘राधा’ का अर्थ है सूरत (आत्मा) और ‘स्वामी’ का अर्थ है कुल मालिक (परमात्मा)। स्वामी शिव दयाल सिंह जी महाराज के तीन परम सिद्ध शिष्य हुए, जिनकी भक्तियोग की कहानियाँ आज भी प्रेरणा देती हैं:

1. बाबा जयमल सिंह जी (डेरा ब्यास के संस्थापक): ये पंजाब के एक सिख सरदार थे जो फौज में नौकरी करते थे और आजीवन ब्रह्मचारी रहे। स्वामी शिव दयाल सिंह जी महाराज ने इन्हें पंजाब जाकर सिख समुदाय में ‘शब्द’ का सच्चा ज्ञान जगाने का हुक्म दिया, क्योंकि लोग केवल कर्मकांडों में उलझ गए थे। गुरु-आज्ञा पाकर इन्होंने ब्यास नदी के किनारे अपना डेरा (आश्रम) बनाया, जिसे आज ‘डेरा ब्यास’ के नाम से जाना जाता है। इन्हीं के शिष्य बाबू सावन सिंह जी हुए, जिन्होंने इस ज्ञान को विदेशों तक पहुँचाया।

2. हुजूर राय शालिग्राम साहिब (एक उच्च अधिकारी की अद्भुत भक्ति): ये अंग्रेजों के राज में उत्तर प्रदेश के पोस्ट मास्टर जनरल (PMG - आईसीएस अधिकारी) थे। गुरु भक्ति में इनका ऐसा रंग चढ़ा कि आगरा के लोग इन्हें “पागल अफसर” कहने लगे। उस समय आगरा में पानी की सुविधा नहीं थी, इसलिए वे रोज भोर में एक मील दूर यमुना नदी से अपने गुरु महाराज के स्नान के लिए घड़े में पानी लाते थे। जब उन्हें पता चला कि लोग ताना मारते हैं कि ‘साहब को दिन में पानी लाने में शर्म आती है’, तो उन्होंने अपने पैरों में घुंघरू बाँध लिए। वे यमुना किनारे छम-छम घुंघरू बजाते हुए और चिल्लाते हुए चलते थे कि— “दुनिया वालों देख लो, राय शालिग्राम अपने गुरु के लिए पानी लेने जा रहा है।” इतनी बड़ी पदवी होने के बावजूद उन्होंने मान-सम्मान को त्याग कर पूर्ण संत गति प्राप्त की।

3. बाबा गरीब दास जी (हिमालय के योगी): ये एक महान हठयोगी थे जो हिमालय में एक पैर पर खड़े होकर साधना करते थे। जब भगवान की खोज में बाबा जयमल सिंह हिमालय पहुँचे, तो उनकी भेंट बाबा गरीब दास से हुई। बाबा गरीब दास ने बताया कि उन्हें आकाशवाणी (Sound of sky) सुनाई देती है कि कुल मालिक का अवतार आगरा में हो चुका है, जो गृहस्थ आश्रम में हैं। इसी बात पर बाबा जयमल सिंह आगरा आए। यमुना किनारे टहलते हुए उन्होंने स्वामी शिव दयाल सिंह जी महाराज के दो शिष्यों को सत्संग की बात करते सुना और उनके पीछे-पीछे पन्नी गली पहुँच गए। सत्संग में उन्हें देखते ही स्वामी शिव दयाल सिंह जी ने कहा— “मेरा पुराने जन्म का मेली आज आ गया।” बाद में बाबा गरीब दास भी खोजते हुए आगरा पहुँच गए। स्वामी शिव दयाल सिंह जी ने बाबा गरीब दास जी को दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (जाट बेल्ट) में नाम प्रचार का आदेश दिया।

पूज्य दादा गुरु जी महाराज की पावन परंपरा

बाबा गरीब दास जी के इसी पावन मिशन से हमारे पूज्य दादा गुरु जी महाराज का इतिहास जुड़ता है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले के इगलास के पास स्थित ग्राम चिरौली के एक शर्मा (ब्राह्मण) परिवार में पूज्य दादा गुरु जी महाराज का अवतरण हुआ।

उनके बड़े भाई पूज्य विष्णु दयाल शर्मा जी और माता जी दिल्ली जाकर बाबा गरीब दास जी से दीक्षित हो चुके थे। जब माता जी छोटे दादा गुरु जी को सत्संग में ले जाती थीं, तो बाबा गरीब दास जी ने उनके बड़े भाई विष्णु दयाल जी को आदेश दिया कि वे अपने छोटे भाई को नाम दान देकर उनकी आध्यात्मिक संभाल करें। इस प्रकार बड़े भाई को ही गुरु रूप में मान लिया गया। संत-मत के इतिहास में यह एक अद्भुत घटना है जहाँ एक ही माता की कोख से दो-दो पूर्ण संतों का प्रकटीकरण हुआ।

युगप्रवर्तक बाबा जयगुरुदेव जी महाराज का आगमन

सन् 1896 में उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के खितौरा गाँव के एक मध्यमवर्गीय किसान परिवार में हमारे परम पूज्य गुरु महाराज (बाबा जयगुरुदेव जी महाराज) का अवतरण हुआ। बचपन में ही माता-पिता के निधन के बाद, उनके हृदय में प्रभु और एक सच्चे गुरु की खोज की तीव्र लगन जाग उठी।

एक लंबे और कठिन आध्यात्मिक सफर तथा सच्चे गुरु की अथक तलाश के बाद, अंततः वे चिरौली गाँव में पूर्ण संत पूज्य दादा गुरु जी महाराज के चरणों में पहुँचे। उन्होंने संसार के सामने “गुरु बिन होई न ज्ञान” की महान मर्यादा का पालन किया और अपने गुरु की शरण लेकर पूर्ण संत-गति प्राप्त की।

सन् 1948 की शून्यता और सन् 1952 में मिशन की स्थापना: सन् 1948 का वर्ष भारत के आध्यात्मिक इतिहास में एक बड़ा शून्य लेकर आया। इसी वर्ष डेरा ब्यास के बाबू सावन सिंह जी, आगरा के बाबू जी महाराज और हमारे पूज्य दादा गुरु जी महाराज ने अपना भौतिक शरीर त्यागा। गुरु गद्दियाँ खाली हो गईं।

इस आध्यात्मिक शून्यता को भरने और जीवों के उद्धार के लिए, 10 जुलाई 1952 को हमारे गुरु महाराज ने काशी (वाराणसी) में गंगा तट पर ‘जयगुरुदेव मिशन’ की ऐतिहासिक नींव रखी।

‘साइंस ऑफ सोल’ और शाकाहारी जीवन: गुरु महाराज ने पूरी दुनिया को ‘साइंस ऑफ सोल’ (आत्मा का विज्ञान) समझाया। उनका स्पष्ट संदेश था कि भौतिक विज्ञान (फिजिक्स, केमिस्ट्री) पढ़कर आप डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक बन सकते हैं, यहाँ तक कि अणु-बम बना सकते हैं और चाँद पर जा सकते हैं; और यह सब मांसाहार करते हुए भी संभव है।

लेकिन, आध्यात्मिक विकास (Spiritual Development) और परमात्मा से मिलन के लिए आहार की पूर्ण शुद्धि अनिवार्य है। अनादि काल का सिद्धांत है— “सत्य अहिंसा परमो धर्म”। जब तक खान-पान शाकाहारी नहीं होगा, तब तक “भजन ना होइन्हे तामस देहा!” के अनुसार कोई भी सच्ची साधना या उपासना नहीं कर सकता। इसी शाकाहारी धर्म और नाम-भजन के संदेश को लेकर जयगुरुदेव मिशन आज अनवरत जन-कल्याण में लगा हुआ है।